
बस्ती के आखिरी छोर पर स्थित वह छोटा सा कमरा आज और भी छोटा लग रहा था। साठ पार कर चुके रामदीन की खाँसी की आवाज़ दीवार की दरारों से टकराकर वापस आ रही थी। नौ साल हो गए थे जब उसकी पत्नी सुजाता उसे और इन दो बच्चों को छोड़कर चली गई थी। तब से वक्त जैसे थम सा गया था, पर मुश्किलें बढ़ती ही गईं।
शाम के सात बज रहे थे। बड़ा बेटा, आकाश, जो शहर की एक दुकान पर दिन भर बोझा ढोता था, आज खाली हाथ लौटा था। उसकी कमीज़ पसीने से तर थी और आँखों में एक अजीब सी लाचारी। छोटा बेटा, अर्जुन, जो अभी स्कूल में था, अपनी फटी हुई किताब के पन्ने पलट रहा था, शायद भूख को भुलाने की कोशिश में।
"आज भी कुछ नहीं मिला, बाबूजी," आकाश ने दीवार के सहारे टिकते हुए कहा। उसकी आवाज़ में वह भारीपन था जो एक 22 साल के युवक में नहीं होना चाहिए था।
रामदीन ने अपनी धुंधली आँखों से आकाश की ओर देखा। वह जानता था कि दो वक्त की सूखी रोटी भी अब उनके नसीब से दूर होती जा रही थी। उसकी खुद की सेहत गिरती जा रही थी और दवाइयों के लिए पैसे जुटाना तो दूर की बात थी।
अचानक, रामदीन के मन में एक पुरानी छवि कौंधी—एक पीला पड़ता कागज़, जिसे उसके पिता ने मरते समय उसके हाथों में थमाया था।
"आकाश... अर्जुन... ज़रा इधर आओ," रामदीन ने कांपती आवाज़ में कहा।
दोनों भाई पिता की चारपाई के पास आकर बैठ गए। रामदीन ने तकिए के नीचे से एक पुरानी जंग लगी चाबी निकाली और कोने में रखे एक लकड़ी के संदूक की ओर इशारा किया।
"उस संदूक की सबसे निचली तह में एक कपड़ा लिपटा हुआ है। उसे निकालो। वह महज़ एक कागज़ नहीं, तुम्हारे दादाजी की दी हुई वह अमानत है जिसे मैंने आज तक दुनिया की नज़रों से छिपा कर रखा था।"
जब आकाश ने वह पुराना, चमड़े जैसा दिखने वाला नक्शा बाहर निकाला, तो कमरे की मद्धम रोशनी में भी उसकी लकीरें चमक उठीं। यह एक खजाने का नक्शा था।
रामदीन की आँखों में एक नई चमक थी। "मैं अब इतना बूढ़ा और बीमार हूँ कि खुद वहाँ नहीं जा सकता, लेकिन तुम दोनों की रगों में जवान खून है। यह नक्शा तुम्हें उस जगह ले जाएगा जहाँ हमारी गरीबी का अंत छिपा है।"



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